एक मृण्मूर्त्ति .....
कई सधे हाथों की गढ़न
किसी कर्मशाला की
सुनियोजित रचना,
सुनहले कोयले की भट्ठी से लहकी
बर्फीली आग में तपा
एक खिलौना - मैं ।
मैं - एक प्रतिबिम्ब !
सजीव अपेक्षाओं
निःस्वार्थ इच्छाओं और
जाग्रत महत्त्वाकांक्षाओं का।
मिट्टी के बने मात्र होने से ही
निर्जीव , निस्पंद
नहीं हो गया हूँ मैं;
मुझमें हैं साँस
और है प्यास ,
जवानी की उमंगें और
रिश्तों का अहसास ।
और भी बहुत कुछ
रचा-बसा है मुझमें,
जो मैं कहूँगा नहीं
करके दिखाऊँगा ।
मैं दिखाऊँगा
अपना वैशिष्ट्य,
न बिखरने का प्रमाण
और
सशरीर साकार सपने;
जो होगा मेरा प्रतिदान -
क्रमशः
सधे हाथों वाले कर्मकार को
उस बर्फीली आग को
और उन अपेक्षाओं को,
जिनका प्रतिबिम्ब हूँ मैं आज ।
कई सधे हाथों की गढ़न
किसी कर्मशाला की
सुनियोजित रचना,
सुनहले कोयले की भट्ठी से लहकी
बर्फीली आग में तपा
एक खिलौना - मैं ।
मैं - एक प्रतिबिम्ब !
सजीव अपेक्षाओं
निःस्वार्थ इच्छाओं और
जाग्रत महत्त्वाकांक्षाओं का।
मिट्टी के बने मात्र होने से ही
निर्जीव , निस्पंद
नहीं हो गया हूँ मैं;
मुझमें हैं साँस
और है प्यास ,
जवानी की उमंगें और
रिश्तों का अहसास ।
और भी बहुत कुछ
रचा-बसा है मुझमें,
जो मैं कहूँगा नहीं
करके दिखाऊँगा ।
मैं दिखाऊँगा
अपना वैशिष्ट्य,
न बिखरने का प्रमाण
और
सशरीर साकार सपने;
जो होगा मेरा प्रतिदान -
क्रमशः
सधे हाथों वाले कर्मकार को
उस बर्फीली आग को
और उन अपेक्षाओं को,
जिनका प्रतिबिम्ब हूँ मैं आज ।

1 comment:
अति सुंदर, हार्दिक बधाई।
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