Sunday, 5 April 2009

....नहीं जान पाता

पता नहीं कब से ......
लालसाओं की लता हुई
छुईमुई-सी
अपेक्षाओं का अयाचित स्पर्श
कब से
उसे सकुचाने लगा है
................नहीं जान पाता


पता नहीं कब से .......
प्राप्त्याशा छिप गई
देयता तले
कर्तव्यबोध का नित तुषारापात
कब से
उसे कुम्हलाने लगा है
...............नहीं जान पाता


पता नहीं कब से.......
सिमट गई है आत्मा
खोल के अन्दर
स्वच्छंदता का अनपेक्षित दमन
कब से
उसे भाने लगा है
...................नहीं जान पाता.

3 comments:

Dr.Rajesh Kumar Singh said...

बहुत सुंदर कविता है मित्र ..बधाई हो ...

alok said...

धन्यवाद सर..

नीलाम्बरा.com said...

बहुत सुन्दर, इस रचना हेतु बधाई स्वीकारें।