Sunday, 5 April 2009
....नहीं जान पाता
लालसाओं की लता हुई
छुईमुई-सी
अपेक्षाओं का अयाचित स्पर्श
कब से
उसे सकुचाने लगा है
................नहीं जान पाता
पता नहीं कब से .......
प्राप्त्याशा छिप गई
देयता तले
कर्तव्यबोध का नित तुषारापात
कब से
उसे कुम्हलाने लगा है
...............नहीं जान पाता
पता नहीं कब से.......
सिमट गई है आत्मा
खोल के अन्दर
स्वच्छंदता का अनपेक्षित दमन
कब से
उसे भाने लगा है
...................नहीं जान पाता.
Thursday, 1 January 2009
यक्ष-प्रश्न
धरा-मंच पर
"सफलता" को अभिनीत करता
एक व्यक्ति- हमारे बीच का कोई ।
.....अभिनय पूर्ण हुआ,
उन दर्शकों के बीच
जिनके पास
कोई दूसरा संसार नहीं है
मापने को तुला-भार नहीं है।
....परन्तु
वह अभिनेता तंद्रा में क्यों है?
....मैं जानता हूँ।
नेपथ्य में बैठे दिग्दर्शक की
असंतुष्ट संवाद-तरंगे
उसकी अभिनय-यात्रा की
एक-एक चूक गिना रही हैं।
शिखर का आलिंगन करने के क्रम में
उसकी मुट्ठियाँ
खुल चुकी थीं
और
फिसल चुका था उसके हाथों से
पूर्व संचित रत्न-कोष।
उचित है
कुछ पाने को कुछ
खोना पड़ता है,
लेकिन अवचेतन में खोए
उन मणियों की याद
उसके चेतन को
अब टीस रही है...
फ़िर;
वह भी तो लाचार है !
एक क्षण को रुकने से
लक्ष्य धुंधले पड़ जाते हैं
क्योंकि
यहाँ राहें भी चलती हैं।
इन चकाचौंध राहों पर
नियति
कई सहयात्री देती है, जो
सहयोगी मित्र की चमड़ी तले
सिर्फ़ और सिर्फ़
ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्धी होते हैं।
मर्त्यलोक के
'सफल' अभिनेता हेतु
क्या,
यह दंश नहीं ?
शिखर-यात्रा की यह त्रासदी
क्या,
मर्मवेधक नहीं ?
कर्मयुद्ध में रमा वह
क्या,
कलि का अर्जुन नहीं ??
