Friday, 25 October 2013

मानवता

शब्द शाश्वत होते हैं,
अर्थ बदल जाया करते हैं
और
सन्दर्भ ही अर्थ निर्धारित करते हैं ।
सभी सुन लें
कि अब सन्दर्भ बदल चुका और
शब्दों के मूल अर्थ बेमानी हो चुके हैं ।

राजनीति  हुई गाली,
शिक्षा बनी व्यवसाय
तो बचपन हुआ अभाव का पर्याय;
जवानी अब कुंठाग्रस्त होती है,
बुढ़ापा शापग्रस्त होने लगा है
और 
भाईचारा तो मानों
'परित्यक्त' की तख्ती लटका चुका है ।

इसी तरह कई
भाववाचक संज्ञाओं के भी
बदल चुके हैं अर्थ,
जैसे  - मानवता ।

क्योंकि
शांति प्रसाद को
महमूद मियां नहीं सुहाते,
न  ही अब
शौकत खान को
निरंजन बाबू भाते हैं;
अब तो इलाके के चौधरियों को
कलुआ भी खटकने लगा है
क्योंकि वह अपना हक माँगने लगा है ।

.....और हाँ,
इसके समानांतर
जारी है हर ओर.....
निरीहों  के रक्त-कुंकुम से
तामसी वृत्तियों का विजयाभिषेक भी ।

मानवता  के अर्थ-सन्दर्भ को
च्युत करने की यह साजिश,
क्या
किसी दुश्मन ग्रह ने रची है ?

....नहीं ।

यह  तो है
मानवता और पशुता के मध्य
निकट भूत में हुए
उस धरा-अनुष्ठान का यज्ञ-फल,
जो किसी वहशी मुहूर्त्त में
संपन्न हुआ होगा -
पुण्य कर्म,
उज्ज्वल विचार और
इंसानी रिश्तों की बलि देकर ।

शब्द-अर्थ-सन्दर्भ के सर्जक
हे जीवश्रेष्ठ मानव !
पशुता तुम्हें
क्योंकर भा गई !!
क्यों रचा तुमने
उन सन्दर्भों को
मानवता जिनमें
हाय, आज पाप हुई !!!

Thursday, 24 October 2013

प्रतिदान

एक मृण्मूर्त्ति .....

कई सधे हाथों की गढ़न
किसी कर्मशाला की
सुनियोजित रचना,
सुनहले कोयले की भट्ठी से लहकी
बर्फीली आग में तपा
एक खिलौना - मैं ।

मैं - एक प्रतिबिम्ब !
सजीव अपेक्षाओं
निःस्वार्थ इच्छाओं और
जाग्रत  महत्त्वाकांक्षाओं का

मिट्टी के बने मात्र होने से ही
निर्जीव , निस्पंद
नहीं हो गया हूँ मैं;
मुझमें हैं साँस
और है प्यास ,
जवानी की उमंगें और
 रिश्तों का अहसास ।

और  भी बहुत कुछ
रचा-बसा है मुझमें,
जो मैं कहूँगा नहीं
 करके दिखाऊँगा ।

मैं  दिखाऊँगा
अपना वैशिष्ट्य,
न बिखरने का प्रमाण
और
सशरीर साकार सपने;

जो होगा मेरा प्रतिदान -
 क्रमशः
सधे हाथों वाले कर्मकार को
उस बर्फीली आग को
और उन अपेक्षाओं को,
जिनका प्रतिबिम्ब हूँ मैं आज ।

Sunday, 5 April 2009

....नहीं जान पाता

पता नहीं कब से ......
लालसाओं की लता हुई
छुईमुई-सी
अपेक्षाओं का अयाचित स्पर्श
कब से
उसे सकुचाने लगा है
................नहीं जान पाता


पता नहीं कब से .......
प्राप्त्याशा छिप गई
देयता तले
कर्तव्यबोध का नित तुषारापात
कब से
उसे कुम्हलाने लगा है
...............नहीं जान पाता


पता नहीं कब से.......
सिमट गई है आत्मा
खोल के अन्दर
स्वच्छंदता का अनपेक्षित दमन
कब से
उसे भाने लगा है
...................नहीं जान पाता.

Thursday, 1 January 2009

यक्ष-प्रश्न

(यह कविता मैंने अपने एक मित्र के जन्मदिन पर आज से आठ वर्ष पहले लिखी थी ......उसकी तत्कालीन जीवन-स्थितियों को लक्ष्य कर लिखी गई यह कविता आज की गलाकाट जिंदगी में अपने अस्तित्व की रक्षा और औचित्य को प्रमाणित करने के लिए संघर्षरत किसी भी व्यक्ति की अंतर्वेदना का पक्ष प्रस्तुत करती है।)



धरा-मंच पर

"सफलता" को अभिनीत करता

एक व्यक्ति- हमारे बीच का कोई ।

.....अभिनय पूर्ण हुआ,

उन दर्शकों के बीच

जिनके पास

कोई दूसरा संसार नहीं है

मापने को तुला-भार नहीं है।

....परन्तु

वह अभिनेता तंद्रा में क्यों है?

....मैं जानता हूँ।

नेपथ्य में बैठे दिग्दर्शक की

असंतुष्ट संवाद-तरंगे

उसकी अभिनय-यात्रा की

एक-एक चूक गिना रही हैं।

शिखर का आलिंगन करने के क्रम में

उसकी मुट्ठियाँ

खुल चुकी थीं

और

फिसल चुका था उसके हाथों से

पूर्व संचित रत्न-कोष।

उचित है

कुछ पाने को कुछ

खोना पड़ता है,

लेकिन अवचेतन में खोए

उन मणियों की याद

उसके चेतन को

अब टीस रही है...

फ़िर;

वह भी तो लाचार है !



एक क्षण को रुकने से

लक्ष्य धुंधले पड़ जाते हैं

क्योंकि

यहाँ राहें भी चलती हैं।

इन चकाचौंध राहों पर

नियति

कई सहयात्री देती है, जो

सहयोगी मित्र की चमड़ी तले

सिर्फ़ और सिर्फ़

ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्धी होते हैं।

मर्त्यलोक के

'सफल' अभिनेता हेतु

क्या,

यह दंश नहीं ?

शिखर-यात्रा की यह त्रासदी

क्या,

मर्मवेधक नहीं ?

कर्मयुद्ध में रमा वह

क्या,

कलि का अर्जुन नहीं ??








Monday, 1 December 2008

प्रगति....!!!

मुर्दा शहर...
ढहते मकान...
गिरती चारदीवारियाँ...!

छोटे दरवाजे...
सिमटते आँगन...
कँटीली फुलवारियाँ...!!

यह वर्तमान की पसंद है
यह मनुज की प्रगति है
इधर न अब आना मनु
तुम्हारी थाती उधर पड़ी है

.....हाहाकार-चीत्कार !
.....क्रंदन-रूदन !!
.....प्रलाप-विलाप !!!
क्षमा करो सृष्टिकर्ता
ये उसी मनु की संतान हैं

.....ईर्ष्या-द्वेष !
....स्वत्व-निजत्व!!
....तृष्णा-वासना !!!
क्षमा करो कुलदेवता
ये उसी मनु की संतान हैं

....खींचतान-मारपीट!
....धर - पकड़ !!
.....ऊंच-नीच !!!
क्षमा करो आदिमनीषी
ये उसी मनु की संतान हैं


पतनोंन्मुख पथ....
विध्वंसात्मक परिवर्तन...
........त्रासद प्राप्तियां

मनु की ये कैसी विरुदावली!
मनु को ये कैसी श्रद्धांजलि!!

............
.............
धन्य निष्प्राण मानव
धन्य मनु-संतान !






Tuesday, 18 November 2008

तुम्हारे बिना...

तुम्हारे बिना....
कितना बड़ा-सा लगता है
सूनेपन का वह संसार
फ़क़त सुना करता था
जिसे
जाना न था
........अब तक

तुम्हारे बिना....
कितना अधूरा-सा लगता है
मेरा अपना यह संसार
महज सोचा करता था
जिसे
जाना न था
.......अब तक
.........तुम्हारे बिना।

Sunday, 16 November 2008

मामा को संदेश पहुँचा!!

सदियों से भारत के बच्चों को बहलाने वाले चंदा मामा के पास वैज्ञानिकों ने तकनीकी संदेश - 'चंद्रयान' - भेज दिया है...विज्ञानं के लिए उपलब्धि और गर्व का विषय है...बधाई! चलो अब कुछ बरसों बाद मामा की धरती पर घर भी बना लेंगे। लेकिन यह सोच कर अन्दर कहीं टीस भी उठती है कि भविष्य के बच्चों का एक प्रिय खिलौना छिन जाएगा. बच्चों को बहलाने के लिए, दूध-भात खिलाने के लिए माँ तब किसे आवाज देगी??