मुर्दा शहर...
ढहते मकान...
गिरती चारदीवारियाँ...!
छोटे दरवाजे...
सिमटते आँगन...
कँटीली फुलवारियाँ...!!
यह वर्तमान की पसंद है
यह मनुज की प्रगति है
इधर न अब आना मनु
तुम्हारी थाती उधर पड़ी है
.....हाहाकार-चीत्कार !
.....क्रंदन-रूदन !!
.....प्रलाप-विलाप !!!
क्षमा करो सृष्टिकर्ता
ये उसी मनु की संतान हैं
.....ईर्ष्या-द्वेष !
....स्वत्व-निजत्व!!
....तृष्णा-वासना !!!
क्षमा करो कुलदेवता
ये उसी मनु की संतान हैं
....खींचतान-मारपीट!
....धर - पकड़ !!
.....ऊंच-नीच !!!
क्षमा करो आदिमनीषी
ये उसी मनु की संतान हैं
पतनोंन्मुख पथ....
विध्वंसात्मक परिवर्तन...
........त्रासद प्राप्तियां
मनु की ये कैसी विरुदावली!
मनु को ये कैसी श्रद्धांजलि!!
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धन्य निष्प्राण मानव
धन्य मनु-संतान !
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