Monday, 1 December 2008

प्रगति....!!!

मुर्दा शहर...
ढहते मकान...
गिरती चारदीवारियाँ...!

छोटे दरवाजे...
सिमटते आँगन...
कँटीली फुलवारियाँ...!!

यह वर्तमान की पसंद है
यह मनुज की प्रगति है
इधर न अब आना मनु
तुम्हारी थाती उधर पड़ी है

.....हाहाकार-चीत्कार !
.....क्रंदन-रूदन !!
.....प्रलाप-विलाप !!!
क्षमा करो सृष्टिकर्ता
ये उसी मनु की संतान हैं

.....ईर्ष्या-द्वेष !
....स्वत्व-निजत्व!!
....तृष्णा-वासना !!!
क्षमा करो कुलदेवता
ये उसी मनु की संतान हैं

....खींचतान-मारपीट!
....धर - पकड़ !!
.....ऊंच-नीच !!!
क्षमा करो आदिमनीषी
ये उसी मनु की संतान हैं


पतनोंन्मुख पथ....
विध्वंसात्मक परिवर्तन...
........त्रासद प्राप्तियां

मनु की ये कैसी विरुदावली!
मनु को ये कैसी श्रद्धांजलि!!

............
.............
धन्य निष्प्राण मानव
धन्य मनु-संतान !






No comments: