Thursday, 24 October 2013

प्रतिदान

एक मृण्मूर्त्ति .....

कई सधे हाथों की गढ़न
किसी कर्मशाला की
सुनियोजित रचना,
सुनहले कोयले की भट्ठी से लहकी
बर्फीली आग में तपा
एक खिलौना - मैं ।

मैं - एक प्रतिबिम्ब !
सजीव अपेक्षाओं
निःस्वार्थ इच्छाओं और
जाग्रत  महत्त्वाकांक्षाओं का

मिट्टी के बने मात्र होने से ही
निर्जीव , निस्पंद
नहीं हो गया हूँ मैं;
मुझमें हैं साँस
और है प्यास ,
जवानी की उमंगें और
 रिश्तों का अहसास ।

और  भी बहुत कुछ
रचा-बसा है मुझमें,
जो मैं कहूँगा नहीं
 करके दिखाऊँगा ।

मैं  दिखाऊँगा
अपना वैशिष्ट्य,
न बिखरने का प्रमाण
और
सशरीर साकार सपने;

जो होगा मेरा प्रतिदान -
 क्रमशः
सधे हाथों वाले कर्मकार को
उस बर्फीली आग को
और उन अपेक्षाओं को,
जिनका प्रतिबिम्ब हूँ मैं आज ।

1 comment:

नीलाम्बरा.com said...

अति सुंदर, हार्दिक बधाई।