Thursday, 1 January 2009

यक्ष-प्रश्न

(यह कविता मैंने अपने एक मित्र के जन्मदिन पर आज से आठ वर्ष पहले लिखी थी ......उसकी तत्कालीन जीवन-स्थितियों को लक्ष्य कर लिखी गई यह कविता आज की गलाकाट जिंदगी में अपने अस्तित्व की रक्षा और औचित्य को प्रमाणित करने के लिए संघर्षरत किसी भी व्यक्ति की अंतर्वेदना का पक्ष प्रस्तुत करती है।)



धरा-मंच पर

"सफलता" को अभिनीत करता

एक व्यक्ति- हमारे बीच का कोई ।

.....अभिनय पूर्ण हुआ,

उन दर्शकों के बीच

जिनके पास

कोई दूसरा संसार नहीं है

मापने को तुला-भार नहीं है।

....परन्तु

वह अभिनेता तंद्रा में क्यों है?

....मैं जानता हूँ।

नेपथ्य में बैठे दिग्दर्शक की

असंतुष्ट संवाद-तरंगे

उसकी अभिनय-यात्रा की

एक-एक चूक गिना रही हैं।

शिखर का आलिंगन करने के क्रम में

उसकी मुट्ठियाँ

खुल चुकी थीं

और

फिसल चुका था उसके हाथों से

पूर्व संचित रत्न-कोष।

उचित है

कुछ पाने को कुछ

खोना पड़ता है,

लेकिन अवचेतन में खोए

उन मणियों की याद

उसके चेतन को

अब टीस रही है...

फ़िर;

वह भी तो लाचार है !



एक क्षण को रुकने से

लक्ष्य धुंधले पड़ जाते हैं

क्योंकि

यहाँ राहें भी चलती हैं।

इन चकाचौंध राहों पर

नियति

कई सहयात्री देती है, जो

सहयोगी मित्र की चमड़ी तले

सिर्फ़ और सिर्फ़

ईर्ष्यालु प्रतिस्पर्धी होते हैं।

मर्त्यलोक के

'सफल' अभिनेता हेतु

क्या,

यह दंश नहीं ?

शिखर-यात्रा की यह त्रासदी

क्या,

मर्मवेधक नहीं ?

कर्मयुद्ध में रमा वह

क्या,

कलि का अर्जुन नहीं ??








2 comments:

Pradeep said...

Relent till today... we discussed it then and can discuss this now also.... i am sure only the chartors have changed.. facts are completely same...fark sirf itna hai ki pehle dukh hota tha... aur ab .... aadat pad gayi hai.

Unknown said...

itni achhi kavita wah bhi itna pehle jehan mein aana tumhare kusagra samvedna ki parichayak hai,aur usse bhi bari baat yah hai ki itne varso ke baad aaj ki paristhiti mein aisa lagta hai jaise ki yah kavita tumne aaj hin likhi hai,aur antim padyansh parh kar to man abibhut ho jata hai ki ek mitr apne mitr ki manobhavnaon ko kitni gahrayi se mahsoos kar sakta hai.
mujhe mallom para hai ki tumhara lakshya kuch anparh logon ki shagirdi karna hai mujhe lagta hai ki tum apne arthik sarokaro ke karan apne vyakti ki aatm hatya karne ki sonch rahe ho.maine kuch apriye shabd prayog kiye hain iske liye kshma karna.parantu ye mere swatah sfurt bhaav the isliye likh diya...
subhekshu
dr.satish